वित्त कार्य का लक्ष्य समय-समय पर व्यवसाय के आवश्यक कोष की व्यवस्था करता है।

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वित्त कार्य के उद्देश्य (Aims of finance function):- वित्त कार्य का लक्ष्य समय-समय पर व्यवसाय के आवश्यक कोष की व्यवस्था करता है। वित्त कार्य के निम्न उद्देश्य हैं: पर्याप्त कोष की प्राप्ति (Acquiring Sufficient Funds):- वित्त कार्य का मुख्य प्रयोजन एक उपक्रम की वित्तीय आवश्यकताओं का आकलन करना और तत्प्श्चात् कोषों के सृजन अर्थात् उन्हें प्राप्त करने  के लिए आवश्यकता है तो अंश पूँजी, ऋण-पत्रों तथा सावधि ऋणों जैसे दीर्घकालीन स्त्रोतों की खोज करनी चाहिए। अपेक्षाकृत दीर्घ गर्भावधि वाले प्रतिष्ठान को ब्याऐसी प्रणाली प्रयोग में होनी चाहिए जिससे कि सीमित ब्याज -प्रभार वाली प्रतिभूतियों के स्थान पर स्वामिगत कोषों पर निर्भर करना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि ऐसे प्रतिष्ठान में कुछ वर्षों तक लाभ ही न हो। कोषों का सही उपयोग (Proper Utilization of Funds):-यघपि कोषों का सृजन करना महत्वपूर्ण तो है, वरन उनका प्रभावी उपयोग भी उतना ही अधिक महत्वपूर्ण होता है। सृजित कोषों का इस ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए कि उनसे अधिकतम लाभ उठाया जा सके। इन कोषों के प्रयोग से मिलने वाला प्रत्याय उनकी लागत से अधिक होना चाहिए। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी समय कोष निष्क्रिय अर्थात् व्यर्थ नहीं रहने दिया जाय। व्यवसाय के विभिन्न परिचालनों या क्रियाओं के लिए निर्दिष्ट कोषों का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए। उन परियोजनाओं को वरीयता दी जानी चाहिए जो व्यवसाय के लिए लाभदायक हो।

लाभदायकता में वृद्धि (Increasing Profitability):-वित्त कार्य के नियोजन एवं नियंत्रण का लक्ष्य प्रतिष्ठान की लाभदायकता में वृद्धि करना होता है। यह एक सत्य है कि मुद्रा से मुद्रा का सृजन होता है। लाभदायकता  बढ़ाने के लिए पर्याप्त कोषों का निवेश करना पड़ता है। वित्त कार्य का नियोजन इस प्रकार किया जाना चाहिए  कि  प्रतिष्ठान को न तो और न ही अपर्याप्त कोष का क्षय ही होगा। संस्था में समुचित नियंत्रण की  एक ऐसी प्रणाली प्रयोग में होनी चाहिए जिससे कि सीमित संसाधनों का अनार्थिक क्रियाओं क्रियाओं में उपयोग रोका जा सके। कोषों को प्राप्त करने की कगत भी व्यवसाय की लाभप्रदता को प्रभावित करती है। यदि कोष सृजन की लागत अधिक है तो लाभदायकता में गिरावट आयेगी। वित्त कार्य में लागत को कोषों से प्रत्याय के समदृश्य करने की भी आवश्यकता पड़ती है। फर्म के मूल्य को अधिकतम करना (Maximixing Firm’s Value):- वित्त कार्य का लक्ष्य फर्म के मूल्य को अधिकतम करना होता है। यह प्रायः कहा जाता है कि एक प्रतिष्ठान का मुख्य उसके लाभदप्रदता से जुड़ा रहता है। यघपि फर्म के मूल्य को लाभप्रदता प्रभावित करता है, फिर यही सब कुछ नहीं है। लाभ के अतिरिक्त, कोषों के सृजन के लिए प्रयुक्त स्त्रोतों, कोषों की लागत, मुद्रा बाजार की दशाएँ, उत्पाद की मांग, इत्यादि ऐसे अन्य विचारणीय तत्व हैं जो फर्म के मूल्य को भी प्रभावित करते हैं।

वित्त कार्य / वित्तीय प्रबंध का क्षेत्र अथवा उसकी विषय-वस्तु (Scope or Content of Finance Function/Financial Management)

वित्तीय प्रबंध का प्रमुख उद्देश्य दीर्घ तथा लघुकालीन पर्याप्त वित्त का प्रबंध करना होता है तथा यह वित्त कम से कम लागत पर प्राप्त कर व्यवसायिक लाभों में वृद्धि करना होता है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए वित्तीय प्रबंधक को निम्न बातों में निम्न बातों में अपना ध्यान केंद्रित करना पड़ता है। वित्तीय आवश्यकताओं का अनुमान लगाना (Estimating Financial Requirements) वित्तीय प्रबंध का प्रथम कार्य अपने व्यवसाय की अल्पकालीन और दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताओं का अनुमान लगाना है। इस प्रयोजन के लिए वह वर्तमान के साथ-साथ भविष्य के लिए एक वित्तीय योजना तैयार करता है। स्थायी सम्पतियों को खरीदने हेतु अपेक्षित राशि के साथ कार्यशील पूँजी के लिए वित्त आवश्यकताओं का निर्धारण करना पड़ता है। ये वित्तीय अनुमान सुदृढ़ वित्तीय सिद्धांतों पर आधरित होने चाहिए जिससे कि  प्रतिष्ठान में न तो अपर्याप्त और न ही आधिक्य कोष की स्थिति उत्पन्न हो जाय। अपर्याप्त कोष की दशा में प्रतिष्ठान के दिन-प्रतिदिन के कार्य-कलापों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जबकि दूसरी ओर, आवश्यकता से अधिक कोष की उपलब्धता प्रबंध में अनावश्यक व्यय करने अथवा सट्टेबाजी की क्रियाओं में लिप्त होने की प्रवृति के लिए प्रेरित के सकता है।

पूँजी ढाँचा का निश्चयन (Deciding Capital Structure)

कोष सृजन के लिए विभिन्न प्रतिभूतियों के प्रकार और उनके अनुपात को पूँजी ढाँचा या संरचना कहते हैं। प्रतिष्ठान के लिए आवश्यक कोष की मात्रा का निर्धारण करने के उपरान्त यह तय किया जाता है कि किन प्रतिभूतियों से वित्त का सृजन किया जाय। स्थायी सम्पतियों के लिए दीर्घकालीन  ऋणों के माध्यम से वित्त-पोषण करना बुद्धिमानों का कार्य माना जाता है। यदि सगर्भता अवधि दीर्घतर है तो अंश सर्वाधिक उपयुक्त स्त्रोत होती है। कार्यशील पूँजी के वित्त-पोषण के लिए भी यदि पूर्ण रूप से नहीं तो आंशिक रूप से दीर्घकालीन कोषों का नियोजन किया जाना चाहिए। किन्तु कार्यशील पूँजी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अधिविकर्ष एवं नकद साख पर पूर्णतः आश्रित रहना उपयुक्त नहीं हो सकता है। कोष के विभिन्न स्त्रोतों के बारे में जो भी निर्णय लिया जाय वह कोष सृजन की लागत से संबद्ध होना चाहिए। यदि किसी कोष के सृजन की लागत अत्यधिक है तो हो सकता है कि वह स्त्रोत दीर्घ काल तक के लिए लाभप्रद न हो। पूँजी संचरना के लिए नियोजित प्रतिभूतियों के प्रकार के बारे में निर्णय तथा इन्हें किस अनुपात में प्रयुक्त किया जाय, इसका निर्णय अत्यंत महत्व रखते हैं क्योंकि ये निर्णय एक उपक्रम की अल्पकालीन और दीर्घकालीन वित्तीय नियोजन कप प्रभावित करते हैं।

वित्त  के स्त्रोत का चयन(Selecting a Source of Finance)

पूँजी संरचना का निश्चय करने के उपरान्त, वित्त के एक उपयुक्त स्त्रोत का चुनाव किया जाता है।जिन विभिन्न स्त्रोतों के वित्त का सृजन किया जा सकता है, उनमे अंश पूँजी, ऋणपत्र तथा वित्तीय संस्थानों व वाणिज्यिक बैंकों से कोष की व्यवस्था, जन निक्षेप, आदि शामिल हैं। यदि अल्पावधियों के लिए वित्त की आवश्यकता है तो इसके स्त्रोत के रूप में बैंक, जन निक्षेप और वित्तीय संस्थाएं उपयुक्त होगे। इसी प्रकार, यदि प्रतिष्ठान वित्त की प्राप्ति के लिए अपनी सम्पतियों को प्रतिभूति के रूप में रखना नहीं चाहे तो जन-निक्षेप एक उपयुक्त स्त्रोत होगा। यदि प्रबंध-तन्त्र वर्तमान पूँजी स्वामित्व को अलग नही रखा जाता है। तो उसे अंशों ऋणपत्रों के निर्गमन को वरीयता प्रदान करनी चाहिए। इस प्रकार वित्त-पोषण के एक उपयुक्त स्त्रोत के चयन की क्रिया में वित्त की आवश्यकता, प्रयोजन, उद्देश्य और अंतर्निहित लागत, आदि तत्व प्रभावकारी हो सकते हैँ।

निवेश के ढाँचे का चुनाव (Selecting a Pattern of Investment)

कोषों की प्राप्ति की व्यवस्था करने के पश्चात् उनके निवेश के ढांचे के बारे में निर्णय लेना पड़ता है। निवेश के रूप में चुनाव का कोषों के प्रयोग से संबंध होता है। यह निर्णय करना महत्वपूर्ण है कि कौन-सी सम्पत्तियाँ क्रय की जायें। उपलब्ध कोष का सर्वप्रथम स्थायी सम्पतियों के क्रय पर व्यय किया जाता है और तदुपरान्त उसका एक उचित हिस्सा कार्यशील कार्यशील पूँजी के लिए प्रतिधारित कर किया जाता है। यही नहीं, विभिन्न वर्गो की सम्पतियों में से भी यह निर्णय लेना आवश्यक होता है कि स्थायी सम्पतियाँ अथवा अन्य सम्पतियों का निवेश हेतु चयन किया जाय। जैसे, संयंत्र व मशीनरी का चयन करते समय हमारे समक्ष विभिन्न वर्ग के संयंत्र व मशीनरी उपलब्ध होगी। पूँजी व्ययों के बारे में निर्णय लेते समय पूँजी बजटन और अवसर लागत विश्लेषण जैसी निर्णयन तकनीकों का प्रयोग करना चाहिए। विभिन्न सम्पतियों पर व्यय करने में सुरक्षा, लाभप्रदता और तरलता के सिद्धांतों को नहीं भूलना चाहिए। इन सिद्धांतों के मध्य भी एक संतुलन बनाये रखना चाहिए, क्योंकि कोई भी व्यक्ति ऐसे किसी परियोजना पर निवेश करना नहीं चाहेगा जो जोखिम से भरा हो, भले ही वह प्रीत\योजना अधिक लाभप्रद क्यों न हो।

उचित रोकड़ प्रबंध (Proper Cash Management)

रोकड़ प्रबंध भी वित्त प्रबंधक का एक महत्वपूर्ण कार्य है। उसे भिन्न-भिन्न समयों पर विभिन्न रोकड़ आवश्यकताओं का आकलन करना पड़ता है और उसके अनुरूप रोक्स प्रबंधन की व्यवस्थाएँ करनी पड़ती है। रोकड़ की (अ) कच्ची सामग्री क्रय करने, (ब) लेनदारों को भुगतान करने, (स) मजदूरी बिलों को पूरा करने, (द) दिन-प्रतिदिन के व्ययों का वहन करने के लिए आवश्यकता होती है। रोकड़ के सामान्य स्त्रोत (अ) नकद बिक्री, (ब) ऋणों की वसूली (स) बैंकों के साथ अल्पकालीन व्यवस्था, आदि हो सकती है। रोकड़ प्रबंध इस प्रकार किया जाना चाहिए कि न तो रोकड़ की कमी ही हो और न ही आवश्यकता से अधिक रोकड़ व्यर्थ रहे।  रोकड़ की कमी के कारण उपक्रम की साख-क्षमता को क्षति पहुंच सकती है। इसी प्रकार निष्प्रयोज्य रोकड़ का यह आशय है कि व्यवसाय में इसका समुचित  ढंग से उपयोग नहीं किया जा सकता है। यह अधिक अच्छा होगा कि ‘रोकड़ प्रवाह विवरण’ नियमित रूप से तैयार किया जाय ताकि कोई भी रोकड़ के विभिन्न स्त्रोतों एवं उपयोगों की जानकारी प्राप्त कर सके। यदि रोकड़ का बहिगर्मन ऐसे व्ययों पर हो रहा हो जिन्हें टाला जा सकता है तो ऐसे व्ययों की कटौती की जा सकती है। रोकड़ आगमन की विभिन्न स्त्रोतों के बारे में एक उचित धारणा से उन विभिन्न स्त्रोतों की उपयोगिता का मूल्यांकन करने में सहायक होती  है। रोकड़ के कुछ ऐसे भी स्त्रोत हो सकते हैं जिनसे उतनी पर्याप्त रोकड़ का आगमन न हुआ हो जितना पूर्ण में सोचा गया था। ऐसी सभी सूचनाएँ रोकड़ के कुशल प्रबंध में सहायक होती हैं। 

वित्तीय नियंत्रण का कार्यान्वयन (Implementing Financial Controls)

वित्तीय प्रबंध की एक कुशल प्रणाली में विभिन्न नियत्रण युक्तियों का सामान्यतया प्रयोग किया है, वे हैं: (अ) विनियोग पर प्रत्याय (ब) बजटरी नियंत्रण, (स) सम-विच्छेद विश्लेषण, (द) लागत नियंत्रण, (य) अनुपात विश्लेषण, (र) लागत एवं आंतरिक अंकेक्षण। विनियोग पर प्रत्याय विभिन्न वित्तीय नीतियों के निष्पादन का मूल्यांकन करने की सर्वोत्तम नियंत्रण युक्ति है। किसी एक विशेष अवधि में विनियोग के संदर्भ  लाभप्रदता  प्रतिशत जितना उच्चतर होगा उतना ही अधिक अच्छा वित्तीय निष्पादन माना जा सकता है। वित्तीय प्रबंधक द्धारा विभिन्न नियंत्रण तकनीकियों  उसे विभिन्न क्षेत्रों  निष्पादन का मूल्यांकन करने तथा आवश्यकता पड़ने पर सुधारात्मक उपाय किये जाने में सहायता प्रदान करता है।

वित्त का अन्य व्यावसायिक कार्यों के साथ संबंध (Relationship of Finance with Other Business Functions/Disciplines)

व्यावसायिक कार्य का आशय कार्यात्मक क्रिया-कलापों से हैं जिन्हें एक उपक्रम अपने वांछित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए करता है। इन कार्यों को उपक्रम के संचालनात्मक क्रियाओं पर आधार वर्गीकृत किया जा सकता है एक व्यवसाय का वित्त कार्य इसके अन्य कार्यात्मक क्षेत्रों से निकट रूप से संबद्ध होता है। कुशल उत्पादन के अभाव में कोषों का क्षय होगा, और उचित विपणन के अभाव में फर्म व्यवसाय में कोष का न्यायोचित ढंग से प्रयोग करने में समर्थ नहीं हो पायेगी। व्यावसायिक उपक्रम के अधिकाधिक महत्वपूर्ण निर्णय कोष की उपलब्धता के आधार पर लिये जाते हैं, हालाँकि व्यवहार में वित्त कार्य को व्यवसाय के सामान्य संचालन में सीमा के रूप में आड़े नहीं आने देना चाहिए। फर्म की वित्तीय नीतियों इस प्रकार निरूपित की जनि चाहिए ताकि वे अन्य कार्यात्मक क्षेत्रों की अपेक्षाओं के अनुरूप हो।

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