DEFINITION OF CORPORATION-BUSINESS FINANCIAL MANAGEMENT

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निगम, व्यावसायिक वित्त, वित्तीय प्रबंध की परिभाषा: निगम वित्त को किसी एक निगमीय उपक्रम में प्रयोग किये जाने वाले समस्त धन या कोषों का सृजन करने व्यस्था करने तथा प्रशासन करने की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।ह्रीलर व्यावसायिक वित्त को “ऐसे व्यावसायिक क्रिया के रूप में परिभाषित करते हैं जो व्यावसायिक उपक्रम की वित्तीय आवश्यकताओं और समग्र उद्देश्यों पूर्ति हेतु पूँजी कोषों की प्राप्ति और उसके संरक्षण से संबंध रखता है।” “व्यापक रूप से व्यवसाय में प्रयुक्त कोषों के नियोजन, सृजन नियंत्रण एवं प्रशासन से संबद्ध गतिविधि को व्यावसायिक वित्त कहा जा सकता है।” प्रेथर एवं वर्ट के शब्दों में, “व्यावसायिक वित्त मुख्य रूप से उघोग के गैर-वित्तीय क्षेत्र में कार्यरत निजी स्वामित्व वाली व्यावसायिक वित्त कहा जा सकता है।” “निगम वित्त निगमीय उपक्रमों की वित्तीय समस्याओं का व्यवहार करता है। इन समस्याओं में नये उपक्रमों के प्रवर्तन संबंधी वित्तीय पहलू एवं प्रारभ्मिक विकास व विस्तार द्धारा उत्पन्न प्रशासनिक प्रश्न, और अंतः में, किसी निगम को जो वित्तीय कठिनाइयों में पड़ गया हो, सहारा देने उअ उसके पुनर्वास के लिए अपेक्षित वित्तीय समायोजनाएं सम्मिलित हैं।”

(DEFINITION OF CORPORATION BUSINESS FINANCIAL MANAGEMENT)

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इस प्रकार, निगम वित्त का क्षेत्र इतना व्यापक है कि इसमें एक व्यावसायिक उपक्रम की स्थापना से लेकर इसके विकास व विस्तार तक कुछ स्थितियों में इसके समापन तक की भी वित्तीय क्रियाओं व गतिवधियों का समावेश होता है। निगम वित्त में प्रायः वित्तीय नियोजन, कोष की प्राप्ति व उनके प्रयोग तथा बँटवारा, और वित्तीय नियंत्रण का व्यवहार किया जाता है।

अंतः में, साधारण शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि निगमीय संस्थाओं द्धारा व्यवहार में लाये जाने वाला वित्तीय प्रबंध निगम वित्त या व्यावसायिक वित्त कहला सकता है। वित्तीय क्रिया इतनी महत्वपूर्ण हो गई है कि इसने वित्तीय प्रबंध को पृथक विषय के रूप में जन्म दिया है। वित्तीय प्रंबध का आशय प्रबंधकीय क्रियाकलाप के उस भाग से हैजिसका संस्था के वित्तीय संसाधनों के नियोजन और नियंत्रण से संबंध होता है। इसमें संस्था के लिए कोष जुटाने के विभिन्न साधनों का पता लगाने का कार्य सम्पन्न होता है। ये साधन व्यवसाय की आवश्यकताओं के लिए उपयुक्त तथा मितव्ययी होने चाहिए। इन साधनों का सर्वाधिक उचित प्रयोग भी वित्तीय प्रबंध का अंग होता है। एक प्रबंधकीय क्रिया के रूप में वित्तीय प्रबंध का हाल ही में विकसित हुआ है। यह अपनी सैद्धांतिक अवधारणों के लिए अर्थशास्त्र जैसे विषय पर बहुत अधिक निर्भर करता है।

“वित्तीय प्रबंध वित्तीय निर्णयन, व्यक्तिगत क्रियावादों एवं उपक्रम के लक्ष्यों में सामजस्क स्थापित करने का क्षेत्र है।” जे एफ. व्रेडबे :- वित्तीय प्रबंध को “व्यावसायिक प्रबंध के एक क्षेत्र के रूप में परिभाषित करते हैं जो पूँजी के विवेकशील प्रयोग तथा पूँजी के साधनों का सावधानीपूर्ण चयन के प्रति समर्पित होता है, ताकि एक व्यय करने वाली इकाई अपने लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए सही दिशा की ओर अग्रसर होने में समर्थ हो सके।” हावर्ड एवं उपन इस मत के हैं कि “वित्तीय प्रबंध वित्त कार्य में नियोजन एवं नियंत्रण कार्यों का अनुप्रयोग होता है।”

निगम वित्त का विकास, वित्तीय प्रबंध

(EVOLUTION OF CORPORATION FINANCE,FINANCIAL MANAGEMENT)

निगम वित्त का उद्भ्व वर्तमान सदी के केवल प्रारम्भिक वर्षों में एकीकरण आंदोलन एवं बड़े आकार वाले व्यावसायिक उपक्रमों के निर्माण के परिणामस्वरूप अध्ययन के एक विशिष्ट क्षेत्र के रूप में हुआ है। निगम वित्त के विकास की प्रारम्भिक अवस्थाओं में बड़े आकार वाले व्यावसायिक उपक्रमों के वित्त-पोषण तथा वित्त के साधनों के अध्ययन पर बल दिया जाता था। किन्तु 1930 के दशक की गंभीर आर्थिक मंदी ने बैंको और अन्य वित्तीय संस्थाओं से वित्त प्राप्त करने में अनेक कठिनाइयों की जन्म दिया। अतएवं, ऐसी परिस्थिति में व्यावसायिक संस्था की सुदृढ़ वित्तीय संरचना, नियोजन और नियंत्रण की उन्नत विधियों एवं तरलता के लिए अधिक चिता करने पर बल प्रदान किया गया। फर्मों की साखदेय क्षमता का मूल्यांकन करने के ढंग और उपायों को विकसित किया गया।

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात में उघोगों के पुनर्संगठन तथा सुदृढ़ वित्तीय संरचना की आवश्यकता को अनिवार्य बना दिया। पचासवें दशक के प्रारम्भ में लाभप्रदता की अपेक्षा तरलता और संस्थागत वित्त की अपेक्षा संस्था के दिन-प्रतिदिन की क्रियाओं पर बल दिया जाने लगा। पूँजी बजटन के रूप में पञ्जी निवेश का विश्लेषण करने की तकनीकें भी विकसित की गई। इस प्रकार, फर्म में निर्णय न लेने की प्रक्रिया शामिल करने के लिए वित्तीय प्रबंध के क्षेत्र का विस्तार किया गया। 

निगम वित्त के विकास की आधुनिक अवस्था पचासवें दशक के मध्य में प्रारम्भ हुयी और निगक वित्त अब अधिक विश्लेषणात्मक और परिमाणात्मक बन गया है। 1960 के दशक ने माइक्रोविट्ज, शार्पे, लीटर इत्यादि द्धारा ‘पोर्टफोलोयो विश्लेषण’ के सिद्धांत में महत्वपूर्ण प्रगति देखा। 1970 के दशक में ‘पूँजी  सम्पति मूल्यन मॉडल‘ विकसित किया गया। इस मॉडल ने सुझाया कि निवेश की कुछ जोखिमों को विविधिकृत पोर्टफोलियो प्रतिभूतियों के धारण द्धारा निष्प्रभावी किया जा सकता है। इस अवधि के दौरान बायनोमियल तथा ब्लैक-शोल्स मॉडल के रूप में ‘विकल्प मूल्यन सिद्धांत विकसित किया गया। 1980 के दशक में वैयक्तिक एवं निगम वित्त में करारोषण की भूमिका पर बल प्रदान किया गया। पूंजी बाजार के नये विलेखों जैसे आदि के प्रवेश के साथ-कोष जुटाने के नये रास्ते खुल गये। बाजार के वैश्वीकरण ने ‘ वित्तीय इंजीनियरिग का उद्भ्व देखाम जिसमें नवीन वित्तीय विलेखों की डिजायन, विकास व कार्यान्वयन एवं वित्त की समस्याओं के सृजनात्मक आदर्श हल निहित होते हैं। वर्तमान समय में निगम वित्त में मॉडल की तकनीकों, गणितीय प्रोग्रामिंग व स्टीम्युलेशन्स का प्रयोग किया जाने लगा है एवं इसने महत्व की दृष्टि से एक प्रमुख स्थान ग्रहण कर लिया है। निष्कर्ष रूप में कहा सकता है कि वित्तीय प्रबंध का उद्भ्व अर्थशास्त्र के शाखा से होते हुए विस्तृत अध्ययन के विशिष्ट विषय के रूप में हुआ है।   

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