जीवित रहने की शक्ति। “ऐसा क्यों?” “प्रेम” “ममता” “आखिर आप चाहती क्या हैं?”

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यह ज़हर मानव शरीर की बीमारियों के रूप में हमारे सामने आता है। इन बीमारियों की नींव तो उस भावना पर रखी जाती है जब मानव शरीर के अंदर प्रेम के स्थान पर नफरत जन्म लेती है।

अब यह बात तो पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाती है कि प्रेम सुख का आधार है। नफरत दुःख का। क्या इच्छा पूर्ति का नाम प्रेम है?

जी हाँ आपने बच्चों को देखा होगा जो अपने माता -पिता से बाज़ारों में सजाए गए खिलौनों को देखकर खिलौना लेने की ज़िद्द करते हैं यदि माता – पिता खिलौना ले लेते हैं तो बच्चा बहुत खुश हो जाता है। यह है प्रेम और यदि उसे खिलौना न लेकर दिया जाए तो बच्चा रोने लगता है। उस बच्चे का रोना नफरत का एक अंश है।

एक बार कोई औरत अपने बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाकर उसे बताने लगी। डॉक्टर साहब न जाने क्यों यह बच्चा दिन प्रतिदिन दुबला होता जा रहा है। मैंने इसके उपचार में कोई कमी नहीं रखी लेकिन इसका स्वास्थ्य बिगड़ता ही चला जा रहा है। अब आप ही इसका उपचार कर दें।

 डॉक्टर ने बच्चे को देखकर उसके लिए दवाएँ लिख दी एक सप्ताह तक दवाएँ खाने के पश्चात जब बच्चा ठीक न हुआ तो उसकी माँ फिर से उसे डॉक्टर के पास ले गई। इस बार भी डॉक्टर ने अच्छी से अच्छी दवाएँ उसे लिख कर दी। परन्तु बच्चा ठीक नहीं हो सका। जब औरत उस बच्चे को फिर से डॉक्टर के पास ले गई तो डॉक्टर स्वयं हैरान था कि उस पर किसी भी दवाई का असर नहीं हो रहा था।



ऐसा क्यों?”

दुःखी मन से उस औरत से डॉक्टर ने पूछा –

श्रीमती जी, आप काम क्या करती हैं?”

मैं एक अभिनेत्री हूँ। मेरा अक्सर समय फिल्मों की शूटिंग तथा फिल्मी पार्टियों में व्यतीत होता है। डॉ ने जब उस औरत की सारी कहानी सुनी तो वह हँसकर उसे देखता हुआ एक नए कागज़ पर दवाएँ लिखने के अंदाज में बैठ गया। दवाएँ लिखकर उसने उस औरत से कहा -“इस दवाई से आपका बच्चा 15 दिन के अंदर ठीक हो जाएगा।

बाहर आकर जैसे ही उस औरत ने नई दवाई का पर्चा पढ़ा तो उसमें लिखा था।

प्रेम

हर चार घंटे के पश्चात इसे प्रेम की एक भारी खुराक दिया करो।

ममता”

इस बच्चे को प्राकृतिक दवा ममता की कमी है। बस उसी दवाई (Medicine) से यह ठीक हो सकता है। माँ ने डॉ की सलाह मानकर बच्चे का उपचार शुरू कर दिया। कुछ ही दिनों के पश्चात बच्चा ठीक हो गया। फिर उस औरत को डॉक्टर के पास जाने की जरूरत ही न पड़ी।

अब आप लोग स्वंय ही जानें कि -“प्रेम और नफरत का आपसी सम्बन्ध क्या हैं? प्रेम जीवन का वह अंग है जो हमें जीने की प्रेरणा देता है। जब तक मानव शरीर (Human Body) में प्रेम की भावना बनी रहेगी तब तक हम संसार की हर बुराई से बचे रहेंगे और जैसे ही प्रेम भावना दबेगी तब घृणा का जन्म होगा। यही घृणा निराशा का प्रतीक है।

देखा जाए तो हम मस्तिष्क (Brain) के अनुसार तो सब सदा बच्चे ही बने रहते हैं क्योंकि हमें जन्म से ही प्रेम मिलता है। प्रेम ही जिंदगी का लक्ष्य है। जब तक हमारे मन में प्रेम की भावना बाकी रहेगी तब तक हम निरोग और प्रसन्नचित्त रहेंगे। इसी विषय को लेकर डॉ आरनोल्ड की एक पुस्तक “THE WILL TO LIVE” (जीवित रहने कीशक्ति) के कुछ अंश आपके सामने रखता हूँ।

एक बार एक रोगी नारी मेरे पास आई। उसने अपनी बीमारी के बारे में बहुत निराश होकर बताया। मैं बहुत से डॉक्टरों के पास जा चुकी हूँ। मुझे तो ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे इस संसार में मेरे लिए कोई डॉ  नहीं रहा।

आखिर आप चाहती क्या हैं?”

कुछ नहीं। मैं केवल आपके पास अपने मन का दुःख बताने आई हूँ। आप मेरी कहानी सुने – सबसे पहले मेरा उपचार मेरे खानदानी डॉ ने शुरू किया था। अंत में उन्होंने अपनी हार को स्वीकार करते हुए साफ कह दिया -यह रोग मेरी समझ से बाहर है। मैं इसका उपचार नहीं कर पाऊँगा। मैंने शहर के अनेक डॉक्टरों से अपना उपचार करवाने के प्रयत्न किए परन्तु मुझे कहीं सफलता नहीं मिली। सब प्रकार के डॉ जैसे दिल , ब्लड -प्रेशर, (Blood Pressure) औरतों के गुप्त रोगों का उपचार करने वाले सबको ही मैंने देख लिया। यहाँ तक कि कैंसर वाले डॉक्टरों के पास जाकर भी मेरा कोई उपचार नहीं हुआ। सब के सब अपने अलग – अलग ढंग से उपचार  करते रहे। सब डॉक्टर किसी एक रोग के बारे में एक मत नहीं थे और मैं अपने आप से ही दुःखी थी। मुझे इस संसार की कोई चीज़ अच्छी नहीं लगती है। ऊँची आवाज़ तो मैं सुन ही नहीं सकती। मेरी पाचन शक्ति काम नहीं कर रही है।

वह अपने मन की बातें कहती रही। मैं बड़े ध्यान से उसकी बात को सुनता रहा। हम डॉक्टरों का तो पेशा ही ऐसा है कि हमें हर एक की बात सुननी पड़ती है। यह तो डॉक्टरों का दुर्भाग्य ही है कि उन्हें सब दुःखी लोग ही मिलते हैं। सुखी तो हमारी ओर नजर उठाकर भी नहीं देखता।

मेरे पास इस प्रकार के अनेक रोगी आ चुके थे। इन सबके पास निराशा थी। धनवान जब दुःखी और रोता हुआ मेरे पास आता था तो मुझे उसका हाल देखकर दया आती थी। मध्यम वर्ग और गरीब लोगों के दुःख तो माने जा सकते थे।

अंत में मैं इस परिणाम तक पहुँचा कि ये सबके सब एक ही रोग के शिकार हैं और वह रोग है – थकान

वे लोग जीवन से थक गए हैं। थकान ही एक ऐसा रोग है जिसका उपचार केवल मनोवैज्ञानिक (Psychological) तरीके से किया जा सकता है। जीवन से थकान बहुत बुरा रोग है। डॉo डीo वाट डलवर ने एक लेख में अपने विचार प्रकट करते हुए बताया है कि – मैंने आज तक जितने भी रोगी देखे हैं उनमें करीब 75% थकान के रोगी थे। इन्हें रोग कोई नहीं होता फिर भी लोग अपने आप को रोगी बनाने का प्रयत्न करते हैं। कुछ लोग तो साधाहरण खाँसी को भी रोग मान लेते हैं। थकान भी तो इसी प्रकार का एक रोग है जो रोग न होते हुए एक रोग है।

वह औरत भी उन रोगियों में से एक थी। वह निरंतर बोले जा रही थी और सुन रहा था। उसके कहने का भावार्थ यही था कि किसी भी डॉक्टर ने आज तक उसका ढंग से उपचार नहीं किया। यदि किसी ने एक रोग का उपचार कर भी दिया तो उसके स्थान पर कई और रोग पैदा हो गए।

इस प्रकार के रोगी तो दिन – रात आते ही रहते हैं। दुःख तो इस बात का है कि इन रोगियों को डॉक्टरों से शिकायत है कि एक के बाद दूसरा रोग उन्हें आ घेरता है। रोगी तो ठीक ही कहते हैं कि जो लोग पैसा खर्च करते हैं, बड़े से बड़े डॉक्टरों के पास जाकर उनकी नई – नई मशीनों से अपने आप को चैक करवाते हैं, इंजेक्शन (Injection) लगवाते हैं, दवाई खाते हैं। धीरे – धीरे उनका शरीर रोगों का घर बन जाता है।

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